शुक्रवार, 17 मई 2013

रंग



जीवन... जीते हैं लोग...
वही... जो, जैसा मिल जाता है उन्हें...
पर इस एक जीवन में... है एक और जीवन...
जिसे, अक्सर भूल जातें हैं हम...
वो है 'रंगों' का जीवन...
हर रंग एक जीवन खुद में...
हर जीवन एक रंग खुद में....
हर रंग की अपनी कहानी...
हर कहानी का अपना रंग...
खुशियाँ, उदासियाँ, उल्लास, विश्वास...
जीवन की तरह हर मोड़ है यहाँ...
हर खुशबू है, हर सपना है...

कभी उदासी में साथ देता...
कभी मुस्कान में चार-चाँद लगता...
इन्सां बदलते देखे...
रंगों का हाथ पकड़ते छोड़ते देखे...
पर ये रंग... ... ...
ये कभी नहीं बदलते...
इनकी तासीर... इनके एहसास, रहते हैं...
हमेशा... एक जैसे...
बस... एहसासना नहीं आता हमें...
कभी जो रंग लगता चमकीला...
कभी उसी की चमक चुभती आँखों को...
कभी जिस रंग की उदासी लुभाती...
कभी उसकी उसकी उदासी ध्यान बंटाती...
इन रंगों ने तो देना चाहा जीवन हमेशा...
ये बताते इनकी तरह है जीवन भी...
हर रंग से भरा...
बस, चुनना है हमें...
सही रंग, और भरना है उसे...
सही मात्रा में... तो ही...
देखेंगे हम, जीवन के 'कैनवास' में...
सजता... हर वो रंग...
जो करता हो पूरा...
हमारा चित्र... हमारा 'जीवन'...!

बुधवार, 15 मई 2013

आनंद मरा नहीं… आनंद मरते नहीं


आनंद मरा नहीं… आनंद मरते नहीं
कल छुट्टियों का पहला दिन था । अभी सोच ही रही थे कि आज क्या-क्या करूँगी । टी0वी0 ऑन कर बैठी  । चैनल बदलते-बदलते देखा एक चैनल पर “हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्मित और निर्देशित 1971 की फ़िल्म “आनंद” आ रही थी । देखते-देखते फिल्म में ऐसे डूबी कि समय का पता ही नहीं चला और इस महान फिल्म ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया । एक बहुत ही मार्मिक फ़िल्म है। तमाम किस्म की मानवीय भावनाओं का इतना सूक्ष्म और सक्षम चित्रण कम ही हिन्दी फ़िल्मों में हो पाया है। मेरे विचार में “आनंद” को भावनात्मक  हिन्दी फ़िल्मों में शायद सबसे अधिक सशक्त माना जा सकता है। इस फ़िल्म को देखकर स्त्री हो या पुरुष –सभी सिनेमा हॉल में रो दिया करते थे। मैंने खुद भी इस फ़िल्म को पाँच-छह बार देखा है –और हर बार दिल भर आया। “आनंद” को इतना तीक्ष्णता देने में कई लोगों का हाथ रहा –लेकिन सबसे बड़ा योगदान स्वयं आनंद उर्फ़ राजेश खन्ना का था।
हिन्दी सिनेमा के पहले सुपरस्टार माने जाने वाले राजेश खन्ना को मैं अपने श्रद्धासुमन “आनंद” पर इस लेख के ज़रिए अर्पित कर रही हूँ। राजेश खन्ना ने ही फ़िल्म में आनंद के आशा और उत्साह से भरे चरित्र को अमर किया था।
“लिम्फ़ोसार्कोमा ऑफ़ द इंटेस्टाइन… वाह, वाह… क्या बात है, क्या नाम है! ऐसा लगता है जैसे किसी वॉयसराय का नाम हो! बीमारी हो तो ऐसी हो नहीं तो नहीं हो!” … आनंद फ़िल्म के कई मशहूर संवादों में से एक यह भी था। यह संवाद आनंद की जिजीविषा को दर्शाता है और उसे दर्शकों के समक्ष एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जिसके लिए “मुश्किल” नामक किसी शब्द का कोई अस्तित्व ही नहीं है। वह हर ग़म में, हर दर्द में मुस्कराना जानता है।
आंतो के कैंसर से पीड़ित होने के बावज़ूद जीवन को भरपूर जीने की इच्छा आनंद के चरित्र का मूलाधार है। उसे मालूम है कि इस दुनिया में उसके गिने-चुने दिन शेष हैं (वैसे हममें से किसे यह मालूम नहीं होता?) इसलिए वह अपने हर क्षण का भरपूर उपयोग लोगों के बीच खुशियाँ बांटने में करना चाहता है (सत्य जानने के बावज़ूद हममें से कितने लोग आनंद की इस फ़िलॉसफ़ी को अपना पाते हैं?)
यह फ़िल्म हमें सोचने और महसूसने के लिए बहुत कुछ देती है। फ़िल्म के खत्म होते-होते हमारी भावनाओं की ज़मीन पर अनगिनत विचारों के अंकुरों की फ़सल तैयार हो चुकी होती है जिसे हम आने वाले कई दिन तक सींचते या काटते रहते हैं। मैंने जब भी इस फ़िल्म को देखा तो हर बार सोचा है कि क्या जिस आनंद को हम फ़िल्म में देखते हैं वह वैसा इसलिए है क्योंकि उसे मालूम है कि वह कुछ ही दिन में इस जहाँ से चला जाएगा। फ़िल्म में आनंद के बीमारी होने से पहले का एक सीन है –जिसमें उसे अपनी प्रेमिका से बात करते दिखाया जाता है। मेरे ख्याल में बीमारी से पूर्व आनंद के मन में भी सैंकड़ो ख़्वाब होंगे। शादी, बच्चे, घर, करियर इत्यादि…लेकिन बीमारी के बाद के जिस आनंद को हम जानते हैं उसके मन में केवल एक ख्वाब है: दुनिया को कुछ देकर जाने का ख्वाब। आनंद के पास देने के लिए खुशी और उम्मीद के अलावा और कुछ नहीं है –सो वह वही बांटता है जो उसके पास है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि खुशी और उम्मीद स्वयं आनंद के जीवन में कोई मायने नहीं रखती। खुशियाँ उसकी समाप्त हो चुकी हैं और मौत की स्पष्ट आहट ने उम्मीद को भी मार दिया है। इसलिए वह दूसरों को खुशी और उम्मीद देकर अपना जीवन जीता है। आनंद की संवेदनशीलता इस संवाद में बखूबी झलकती है: “तुझे क्या आशीर्वाद दूं बहन? ये भी तो नहीं कह सकता कि मेरी उम्र तुझे लग जाए”
आनंद के चरित्र की इन विशेषताओं को अपनाना कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन फिर भी कोई विरला इंसान ही ऐसा कर पाता है। यह एक लोकप्रिय प्रश्न है कि यदि आपको यह पता चल जाए कि आपके जीवन में बस पाँच मिनट ही शेष बचे हैं तो आप इन पाँच मिनट में क्या करेंगे? इस प्रश्न के उत्तर में आप जिन भी चीज़ों को करने के बारे में सोचते हैं –दरअसल वही चीज़ें आपके जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण होती हैं। हमारे जीवन में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्या है –यह जानना कितना आसान है ना! लेकिन फिर भी हम अपना अधिकांश जीवन उन चीज़ों को करते हुए बिताते हैं जो हमारे लिए उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। कैसी विडम्बना है! शायद इसी का नाम माया है जो हमारी बुद्धि पर पर्दा डाले रहती है।
डॉक्टर भास्कर बैनर्जी (अमिताभ बच्चन) का चरित्र फ़िल्म की शुरुआत से लेकर आखिर तक एक बड़े बदलाव से गुज़रता है। ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों से हताश और कुछ हद तक पत्थर हो चुका भास्कर बैनर्जी आनंद के निर्मल मन की कोमलता से बच नहीं पाता और आखिरी सीन में आनंद की मौत पर एक बच्चे की तरह रोता पाया जाता है। आनंद की देह मर गई; लेकिन जाने से पहले उसने स्वयं को कितने ही लोगों के जीवन का हिस्सा बना दिया। इसीलिए भास्कर ने कहा कि:


 आनंद
मरा 
नहीं… 
आनंद 
मरते 
नहीं.......

बुधवार, 27 मार्च 2013

सपने




सपने बुनती हूँ, टूट जाते हैं,
टूटकर बिखर जाते हैं,
उनमें से एक टुकड़ा चुनकर,
फिर सपने बुनने लगती हूँ…
आशाएँ जगाती हूँ, टूट जाती है,
निराशा आती है,
दुख के काँटों के बीच,
सुख के कुछ फूल चुनने लगती हूँ…..
प्रयास करती हूँ, विफल हो जाते हैं,
सहम जाती हूँ,
विफलता के अन्धकार के उस पार,
रोशनी की किरण ढूँढने लगती हूँ……
नियति की सुनती हूँ, हार जाती हूँ,
थम जाती हूँ,
चुपचाप हाथ पर हाथ रख,
 फिर हिम्मत जुटाने लगती हूँ…
फिर सपने बुनने लगती हूँ…
फिर सपने बुनने लगती हूँ…


गुरुवार, 21 मार्च 2013

प्रकृति


हो लें प्रकृति के साथ.....
अकेलापन कभी-कभी अपने आप में बहुत सुखद लगता है, अक्‍सर ये हमें अनायास ही प्रकृति‍ से जोड़ देता है। कई बार आपको लगा होगा जैसे मीलों कहीं दूर नि‍कल जाएँ, हवा की सरसराहट के साथ, पत्तों की टकराहट को सुनते हुए, कहीं दि‍शाहीन हो जाएँ। और अचानक अपने आपको सि‍र्फ़ और सि‍र्फ़ प्रकृति‍ के साथ पाएँ।

प्रकृति वास्‍तव में मानव की सच्‍ची सहचरी है। जब कोई आपके साथ नहीं होता तो आप प्रकृति‍ के साथ हो लेते हैं या शायद वह आपके साथ हो लेती है। मनुष्‍य जीवन में जो कमी प्रकृति‍ पूरी कर सकती है वो कोई दूसरा नहीं कर सकता। हम अपने भौति‍क जीवन की आपाधापी में भले कभी प्रकृति‍ के बारे में सोचना भूल जाएँ लेकि‍न यह हमेशा हमें अपने होने का एहसास कराती है। प्रकृति‍ माँ की तरह हमें अदृश्‍य रूप में सब कुछ देती है। मई-जून की कड़ी धूप और गरम हवाओं से जब हम झुलस जाते हैं तो अचानक ही वह बादलों का आंचल हमें उढ़ा देती है और बारि‍श की पहली फुहार से सारी उष्‍णता हर लेती है।

बहुत भाग्यशाली हैं हम जो मनुष्‍य रूप में इस इतनी अद्भुत, इतनी सुंदर प्रकृति‍ के दर्शन कर पाते हैं, उसे अनुभव कर पाते हैं, उसका आनंद ले पाते हैं। दूसरी तरफ़ उन लोगों के प्रारब्‍ध पर पछतावा भी होता है जो इसे देख नहीं सकते, सि‍र्फ महसूस कर सकते हैं।

प्रकृति‍ और साहि‍त्य का संबंध तो अटूट और प्रमाणि‍क माना जाता है। बहुत से कवियों, लेखकों और साहि‍त्‍यकारों ने अपनी कालजयी रचनाएँ प्रकृति‍ के सान्‍नि‍ध्‍य में लि‍खीं। जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमि‍त्रानंदन पंत और रामकुमार वर्मा जैसे कवि‍यों को तो प्रकृति उपासक कवि कहा जाता है। प्रकृति‍ ने ही लोगों कवि‍, शायर और चि‍त्रकार बनाया है।

आमतौर पर हम झरनों की कल, पक्षि‍यों का कलरव, अनेक प्रकार के अन्‍न, फूलों की महक, बारि‍श की बूंदों, ठंडी हवाओं और पेड़ों के झूमने को ही प्रकृति‍ कहते हैं। लेकि‍न वास्‍तव में प्रकृति‍ अपने अनगि‍नत रूपों के साथ हमारे बीच वि‍द्यमान है। जहाँ वह एक ओर अपने मातृ सुलभ प्रेम को उपर्युक्त सभी रूपों में प्रदर्शि‍त करती है तो दूसरी तरफ बि‍जली, तूफान, आँधी, बवंडर, भूकंप, चक्रवात, ज्वालामुखी जैसे रौद्र रूपों में भी हमारे सामने आती है। ठीक वैसे ही जैसे माँ अपने बच्‍चे की शैतानि‍यों से तंग आकर व अपने धैर्य की पराकाष्‍ठा हो जाने पर उस पर बरस पड़ती है।

कवि‍यों की बात ओर है वह तो शीतल बयार को भी अपनी कवि‍ता का वि‍षय बना सकते हैं और आक्रांत ज्‍वालामुखी को भी। लेकि‍न, साधारण मनुष्‍य को अपने जीवन में सबकुछ साधारण, सरल और शांत हो ऐसी अपेक्षा होती है। सागर में आवाजाही करती लहरों को वो दूर से देखना पसंद करता है। क्‍योंकि‍ डूबते हुए को बचाना तो मुमकि‍न हो जाता है लेकि‍न जि‍से बहाव अपने साथ खींच ले उसका क्‍या कहा जा सकता है।

प्रकृति मानवीय संवेदनाओं में रची बसी है। जब भी हम दुखी होते हैं तब भी प्रकृति‍ की शरण लेते हैं और जब खुश होते हैं तब भी प्रकृति‍ का ही साथ चाहते हैं। कभी महसूस करके देखि‍ए ये आपके साथ रोती है और आपके साथ हँसती भी है



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बुधवार, 20 मार्च 2013

कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है


जीवन
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है
भविष्य सुधारने के लिए आप क्या करते हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गए तो …..? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। भविष्य संवारने के सिलसिले में मैं अपने ब्लाग पर गोपाल दास नीरज की उस कविता को रख रही हूँ, जिसमें उन्होंने फरमाया है कि कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है, चंद खिलौने के खोने से बचपन नहीं मरा करता है। सो, मित्रों परम आदरणीय, सुप्रसिद्ध कवि व गीतकार नीरज जी के प्रति पूर्ण सम्मान भाव के साथ उनकी रचना मैं यहां अपनी श्रृंखला में ऱख रही हूँ । इस आशा के साथ कि भविष्य संवारने की दिशा में जुटे लोगों में इससे कुछ आशाओं का संचार हो पाए। सो पेश है गोपाल दास नीरज की यह अमर रचना -

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों
मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आंख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी

गीली उमर बनाने वालों
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गई तो क्या है
खुद ही हल हो गई समस्या
आंसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या

रुठे दिवस मनाने वालों
फटी कमीज सिलाने वालों
कुछ दीयों के बुझ जाने से
आंगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहां पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती

वस्त्र बदलकर आने वालों
चाल बदलकर जाने वालों
चंद खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है

मंगलवार, 19 मार्च 2013

जीवन संघर्षो से न घबराना मनुष्यता है


जीवन संघर्षो से न घबराना मनुष्यता है
                  कई विचारकों का मत है कि अगर हम कोई जोखिम नहीं लेते हैं, तो वह अपने-आप में सबसे बड़ा जोखिम है। यह सही भी है कि ज़्यादातर लोग जोखिम लेने से डरते हैं। इसकी कई वजहें होती हैं, लेकिन जो सबसे बड़ी वजह है, वह है संकल्प और विचार शक्ति की कमी ।
                  कहने को तो विचार शक्ति और संकल्प का अभाव जानवरों में होता है, पर जब कोई इंसान बिना विचारे कोई ऐसा काम कर बैठता है, तो कहा जाता है कि वह तो निरा पशु हो गया है। यानी इंसान होकर भी अगर पशुओं जैसी जिंदगी जीएं, तो जीना क्या और मरना क्या ?  इसीलिए वेद में कहा गया है- " मनुर्भव, यानी मनुष्य बनो। " इसका मतलब हे कि महज इंसान के वेश में हम इंसान सही मायने में तब तक नहीं होते, जब तक हमारे अंदर इंसानियत के सद् गुण पैदा नहीं होते और जब तक हम अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करते।
                  विज्ञान के मत में इंसान जब से धरती पर पैदा हुआ है, लगातार प्रगति कर रहा है। यह प्रगति इंसान को जानवरों से अलग करती है। धर्म भी कहता है कि इंसान का जन्म लेना, तभी सार्थक है, जब उसमें मनुष्यत्व और देवत्व के रास्ते पर बढ़ने की इच्छाशक्ति और साधना हो। बहरहाल, जोखिम उठाना और जोखिम लेने से घबराना, दोनों ही प्रवृत्तियां इस बात को तय करती हैं कि हम में कितनी इंसानियत बाकी है । हर इंसान में पशुता, मनुष्यता और देवत्व के गुण होते हैं। शिक्षा, संस्कार, विचार ओर संकल्प-शक्ति जिस व्यक्ति में जिस रूप में होती है, वह उसी तरह बन जाता है । दरअसल, हमारे मस्तिष्क की बनावट ऐसी है, जिसमें विचारों की अनंत संभावनाएँ होती है। लेकिन एक आम इंसान अपनी शक्तियों का एक या दो प्रतिशत ही इस्तेमाल करता है। शक्तियों के समुचित इस्तेमाल नहीं होने के कारण ही किसी व्यक्ति के बेहतर इंसान बनने की संभावना कम होती है। यही वजह है कि ज़्यादातर लोग पूरी ज़िंदगी पशुओं की तरह ही सिर्फ़ सोने-खाने में बिता देते है।
               पर यहां सवाल यह है कि क्या जोखिम उठाना हमेशा लाभदायक होता है?  कभी-कभी तो तमाम जोखिम उठाकर भी लोग ऐसा कार्य कर डालते है, जो न उनके लिए लाभदायी होते है, न परिवार और समाज के लिए, इस बारे में यह कहना उचित होगा कि ऐसा जोखिम उठाना इंसानी संघर्ष का नमूना नहीं, बल्कि शैतान प्रवृत्ति का प्रतीक है। इसलिए जोखिम उठाने से पहले यह विचार ज़रूर कर लेना चाहिए कि वह हितकरी हो सकता है या अहितकारी। मौजूदा वक्त में आतंकवादियों, नक्सलवादियों या इसी तरह की प्रवृत्ति वाले अपराधियों द्वारा हिंसा के सहारे कोई मकसद हासिल करने का काम शैतानी जोखिम के दायरे में आता है। ऐसे जोखिम भरे कार्यों से सभी को नुकसान ही होता है।
            गांधी जी ने कहा था कि " साध्य और साधक " की पवित्रता से ही व्यक्ति की सफलता का ठीक-ठीक मूल्यांकन हो सकता है। मौजूदा दौर में ज़्यादातर लोगों के " साध्य " और "साधन" दोनों ही अपवित्र हो गए हैं। इसलिए जो कुछ हासिल हो रहा है, उसे मानवीय संघर्ष का परिणाम नहीं कह सकते हैं। यानी जोखिम ज़रूर उठाएँ, लेकिन साथ ही, यह भी देखा जाए कि यह जोखिम भरा काम खुद के लिए, समाज के लिए राष्ट्र और समूचे संसार के लिए सकारात्मक है या नकारात्मक।
              यह कैसे तय हो कि कौन सा काम सकारात्मक नतीजे वाला हो सकता है और कौन सा नकारत्मक नतीजे वाला ?  यानी किस काम को किया जाए और किसे छोड़ा जाए ?  इसका जवाब यह है कि महापुरूषों के आचरण और वेद-पुराणों में दिए गए दृष्टांत इस काम में हमारी मदद करते हैं। उनके मार्गदर्शन से हम सही या गलत का फैसला कर सकते हैं।
              अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए जीवन संघर्ष से घबराए बिना जब हम एक सकारात्मक नतीजे दे सकने वाले जोखिम का चुनाव करते हैं, तो वास्तविक अर्थों में हम हर प्रकार से दैहिक, भौतिक संकट को दूर कर सकते है। यही सच्ची मनुष्यता है और मनुष्य होने के नाते हमें इसी नीति का पालन करना चाहिए ।

सोमवार, 11 मार्च 2013

मैं खुश होती हूँ


मैं खुश होती हूँ , जब कोई सपना देखती हूँ
मैं खुश होती हूँ जब उसे साकार होते हुए देखती हूँ ..
अगर विफल हो जाती हूँ तो कारण सोचती हूँ
फिर, सोचते-सोचते एक नयी दुनिया में भी पहुँच जाती हूँ..
बहुत समय तक इस दुनिया से कट जाने के बाद
मैं खुद को झकझोर के उठाती हूँ
पूछती हूँ खुद से, के
…
“क्यों नही मैं वो पा पाती हूँ
जिसे सबसे ज्यादा पाने को अकुलाती हूँ
”,
व्याकुल नैना रहते है हर पल निराश
फिर करते है वो अपने इष्ट देव को याद
प्रभु के सुमरन से ही कर पाती हूँ , मैं खुद को तैयार
फिर लग जाती हूँ देखने उस सपने को हज़ार बार
और फिर से खुश होकर तैयार हो जाती हूँ
भरने को एक नई और ऊँची उड़ान
…..
और ऊँची....
और ऊँची उड़ान.......