जो बादलों में उतर रही गगन से आकर, जो पर्वतों पर बिखर रही है सफ़ेद चादर, वही तो मैं हूँ.... वही तो मैं हूँ.... जो इन दरख्तों के सब्ज़ पत्तों पे डोलती है, जो ओस बनकर हर मौसम को खेलती है, वही तो मैं हूँ.....वही तो मैं हूँ....
शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013
मंगलवार, 17 दिसंबर 2013
अग्नि-कविता
अग्नि-कविता
एक
अग्नि-कविता तुम्हारे लिए
इसे
दीये की भांति सहेज लेना
एक
लौ-हृदय जो शायद
तुम्हारा
हृदय भी लौ कर दे
अग्नि
से सर्वस्व भर दे
उस
नाड़ी में जिसमें प्रज्ज्वलित हो
रुधिर
भी
उन
साँसों में जिनमें यज्ञ का
आह्वान
उठे
उस
अग्नि-कविता को अंजुरि में
सहेज
लेना
जब
तुम्हारा मुख दीप्तिमान हो
तुम्हारा
प्रकटन कान्ति
उस
लौ-हृदय को भीतर
आत्मसात
कर लेना
इन
चिंगारियों को कुछ क्षण
अंदर
सुलगने देना
एक
अग्नि-कविता तुम्हारे लिए
एक
अग्नि-कविता तुम्हारे लिए.....
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