जो बादलों में उतर रही गगन से आकर, जो पर्वतों पर बिखर रही है सफ़ेद चादर, वही तो मैं हूँ.... वही तो मैं हूँ.... जो इन दरख्तों के सब्ज़ पत्तों पे डोलती है, जो ओस बनकर हर मौसम को खेलती है, वही तो मैं हूँ.....वही तो मैं हूँ....
शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013
मंगलवार, 17 दिसंबर 2013
अग्नि-कविता
अग्नि-कविता
एक
अग्नि-कविता तुम्हारे लिए
इसे
दीये की भांति सहेज लेना
एक
लौ-हृदय जो शायद
तुम्हारा
हृदय भी लौ कर दे
अग्नि
से सर्वस्व भर दे
उस
नाड़ी में जिसमें प्रज्ज्वलित हो
रुधिर
भी
उन
साँसों में जिनमें यज्ञ का
आह्वान
उठे
उस
अग्नि-कविता को अंजुरि में
सहेज
लेना
जब
तुम्हारा मुख दीप्तिमान हो
तुम्हारा
प्रकटन कान्ति
उस
लौ-हृदय को भीतर
आत्मसात
कर लेना
इन
चिंगारियों को कुछ क्षण
अंदर
सुलगने देना
एक
अग्नि-कविता तुम्हारे लिए
एक
अग्नि-कविता तुम्हारे लिए.....
शुक्रवार, 17 मई 2013
रंग
जीवन... जीते हैं लोग...
वही... जो, जैसा मिल जाता है उन्हें...
पर इस एक जीवन में... है एक और जीवन...
जिसे, अक्सर भूल जातें हैं हम...
वो है 'रंगों' का जीवन...
हर रंग एक जीवन खुद में...
हर जीवन एक रंग खुद में....
हर रंग की अपनी कहानी...
हर कहानी का अपना रंग...
खुशियाँ, उदासियाँ, उल्लास, विश्वास...
जीवन की तरह हर मोड़ है यहाँ...
हर खुशबू है, हर सपना है...
कभी उदासी में साथ देता...
कभी मुस्कान में चार-चाँद लगता...
इन्सां बदलते देखे...
रंगों का हाथ पकड़ते छोड़ते देखे...
पर ये रंग... ... ...
ये कभी नहीं बदलते...
इनकी तासीर... इनके एहसास, रहते हैं...
हमेशा... एक जैसे...
बस... एहसासना नहीं आता हमें...
कभी जो रंग लगता चमकीला...
कभी उसी की चमक चुभती आँखों को...
कभी जिस रंग की उदासी लुभाती...
कभी उसकी उसकी उदासी ध्यान बंटाती...
इन रंगों ने तो देना चाहा जीवन हमेशा...
ये बताते इनकी तरह है जीवन भी...
हर रंग से भरा...
बस, चुनना है हमें...
सही रंग, और भरना है उसे...
सही मात्रा में... तो ही...
देखेंगे हम, जीवन के 'कैनवास' में...
सजता... हर वो रंग...
जो करता हो पूरा...
हमारा चित्र... हमारा 'जीवन'...!
बुधवार, 15 मई 2013
आनंद मरा नहीं… आनंद मरते नहीं
आनंद मरा नहीं… आनंद मरते नहीं
कल छुट्टियों का पहला दिन था । अभी सोच ही रही थे कि आज क्या-क्या करूँगी ।
टी0वी0 ऑन कर बैठी । चैनल बदलते-बदलते देखा
एक चैनल पर “हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्मित और निर्देशित 1971 की फ़िल्म “आनंद”
आ रही थी । देखते-देखते फिल्म में ऐसे डूबी कि समय का पता ही नहीं चला
और इस महान फिल्म ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया । एक बहुत ही मार्मिक फ़िल्म
है। तमाम किस्म की मानवीय भावनाओं का इतना सूक्ष्म और सक्षम चित्रण कम ही हिन्दी
फ़िल्मों में हो पाया है। मेरे विचार में “आनंद” को भावनात्मक हिन्दी फ़िल्मों में
शायद सबसे अधिक सशक्त माना जा सकता है। इस फ़िल्म को
देखकर स्त्री हो या पुरुष –सभी सिनेमा हॉल में रो दिया करते
थे। मैंने खुद भी इस फ़िल्म को पाँच-छह बार देखा है –और हर बार दिल भर आया। “आनंद” को
इतना तीक्ष्णता देने में कई लोगों का हाथ रहा –लेकिन सबसे
बड़ा योगदान स्वयं आनंद उर्फ़ राजेश खन्ना का था।
हिन्दी सिनेमा के पहले सुपरस्टार माने जाने वाले राजेश खन्ना को मैं
अपने श्रद्धासुमन “आनंद” पर इस लेख के ज़रिए अर्पित कर रही हूँ। राजेश खन्ना ने ही फ़िल्म में
आनंद के आशा और उत्साह से भरे चरित्र को अमर किया था।
“लिम्फ़ोसार्कोमा ऑफ़ द इंटेस्टाइन… वाह,
वाह… क्या बात है, क्या
नाम है! ऐसा लगता है जैसे किसी वॉयसराय का नाम हो! बीमारी हो तो ऐसी हो नहीं तो
नहीं हो!” … आनंद फ़िल्म के कई मशहूर संवादों में
से एक यह भी था। यह संवाद आनंद की जिजीविषा को दर्शाता है और उसे दर्शकों के समक्ष
एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जिसके लिए “मुश्किल”
नामक किसी शब्द का कोई अस्तित्व ही नहीं है। वह हर ग़म में, हर दर्द में मुस्कराना जानता है।
आंतो के कैंसर से पीड़ित होने के बावज़ूद जीवन को भरपूर जीने की इच्छा आनंद
के चरित्र का मूलाधार है। उसे मालूम है कि इस दुनिया में उसके गिने-चुने दिन शेष
हैं (वैसे हममें से किसे यह मालूम नहीं होता?) इसलिए वह अपने हर क्षण का भरपूर उपयोग लोगों के बीच
खुशियाँ बांटने में करना चाहता है (सत्य जानने के बावज़ूद हममें से कितने लोग आनंद
की इस फ़िलॉसफ़ी को अपना पाते हैं?)
यह फ़िल्म हमें सोचने और महसूसने के लिए बहुत कुछ देती है। फ़िल्म के खत्म होते-होते हमारी
भावनाओं की ज़मीन पर अनगिनत विचारों के अंकुरों की फ़सल तैयार हो चुकी होती है जिसे
हम आने वाले कई दिन तक सींचते या काटते रहते हैं। मैंने जब भी इस फ़िल्म को देखा तो
हर बार सोचा है कि क्या जिस आनंद को हम फ़िल्म में देखते हैं वह वैसा इसलिए है
क्योंकि उसे मालूम है कि वह कुछ ही दिन में इस जहाँ से चला जाएगा। फ़िल्म में आनंद
के बीमारी होने से पहले का एक सीन है –जिसमें उसे अपनी
प्रेमिका से बात करते दिखाया जाता है। मेरे ख्याल में बीमारी से पूर्व आनंद के मन
में भी सैंकड़ो ख़्वाब होंगे। शादी, बच्चे, घर, करियर इत्यादि…लेकिन
बीमारी के बाद के जिस आनंद को हम जानते हैं उसके मन में केवल एक ख्वाब है: दुनिया
को कुछ देकर जाने का ख्वाब। आनंद के पास देने के
लिए खुशी और उम्मीद के अलावा और कुछ नहीं है –सो वह वही
बांटता है जो उसके पास है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि खुशी और उम्मीद स्वयं
आनंद के जीवन में कोई मायने नहीं रखती। खुशियाँ उसकी समाप्त हो चुकी हैं और मौत की
स्पष्ट आहट ने उम्मीद को भी मार दिया है। इसलिए वह दूसरों को खुशी और उम्मीद देकर
अपना जीवन जीता है। आनंद की संवेदनशीलता इस संवाद में बखूबी झलकती है: “तुझे क्या आशीर्वाद दूं बहन? ये भी तो नहीं कह सकता
कि मेरी उम्र तुझे लग जाए”
आनंद के चरित्र की इन विशेषताओं को अपनाना कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन
फिर भी कोई विरला
इंसान ही ऐसा कर पाता है। यह एक लोकप्रिय प्रश्न है
कि यदि आपको यह पता चल जाए कि आपके जीवन में बस पाँच मिनट ही शेष बचे हैं तो आप इन
पाँच मिनट में क्या करेंगे? इस प्रश्न के उत्तर में आप जिन
भी चीज़ों को करने के बारे में सोचते हैं –दरअसल वही चीज़ें
आपके जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण होती हैं। हमारे जीवन में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण
क्या है –यह जानना कितना आसान है ना! लेकिन फिर भी हम अपना
अधिकांश जीवन उन चीज़ों को करते हुए बिताते हैं जो हमारे लिए उतनी महत्त्वपूर्ण
नहीं हैं। कैसी विडम्बना है! शायद इसी का नाम माया है जो हमारी बुद्धि पर पर्दा
डाले रहती है।
डॉक्टर भास्कर बैनर्जी (अमिताभ बच्चन) का चरित्र फ़िल्म की शुरुआत से लेकर
आखिर तक एक बड़े बदलाव से गुज़रता है। ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों से हताश और कुछ हद
तक पत्थर हो चुका भास्कर बैनर्जी आनंद के निर्मल मन की कोमलता से बच नहीं पाता और आखिरी सीन में आनंद की मौत पर
एक बच्चे की तरह रोता पाया जाता है। आनंद की देह मर
गई; लेकिन जाने से पहले उसने स्वयं को कितने ही लोगों के
जीवन का हिस्सा बना दिया। इसीलिए भास्कर ने कहा कि:
आनंद
मरा
नहीं…
आनंद
मरते
नहीं.......
मरा
नहीं…
आनंद
मरते
नहीं.......
बुधवार, 27 मार्च 2013
सपने
सपने बुनती हूँ, टूट जाते हैं,
टूटकर बिखर जाते हैं,
उनमें से एक टुकड़ा चुनकर,
फिर सपने बुनने लगती हूँ…
आशाएँ जगाती हूँ, टूट जाती है,
निराशा आती है,
दुख के काँटों के बीच,
सुख के कुछ फूल चुनने लगती हूँ…..
प्रयास करती हूँ, विफल हो जाते हैं,
सहम जाती हूँ,
विफलता के अन्धकार के उस पार,
रोशनी की किरण ढूँढने लगती हूँ……
नियति की सुनती हूँ, हार जाती हूँ,
थम जाती हूँ,
चुपचाप हाथ पर हाथ रख,
फिर हिम्मत जुटाने लगती हूँ…
फिर सपने बुनने लगती हूँ…
फिर सपने बुनने लगती हूँ…
गुरुवार, 21 मार्च 2013
प्रकृति
हो लें प्रकृति के साथ.....
अकेलापन कभी-कभी अपने आप में बहुत सुखद लगता है, अक्सर ये हमें अनायास ही प्रकृति से जोड़ देता है। कई बार आपको लगा होगा जैसे मीलों कहीं दूर निकल जाएँ, हवा की सरसराहट के साथ, पत्तों की टकराहट को सुनते हुए, कहीं दिशाहीन हो जाएँ। और अचानक अपने आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रकृति के साथ पाएँ।
प्रकृति वास्तव में मानव की सच्ची सहचरी है। जब कोई आपके साथ नहीं होता तो आप प्रकृति के साथ हो लेते हैं या शायद वह आपके साथ हो लेती है। मनुष्य जीवन में जो कमी प्रकृति पूरी कर सकती है वो कोई दूसरा नहीं कर सकता। हम अपने भौतिक जीवन की आपाधापी में भले कभी प्रकृति के बारे में सोचना भूल जाएँ लेकिन यह हमेशा हमें अपने होने का एहसास कराती है। प्रकृति माँ की तरह हमें अदृश्य रूप में सब कुछ देती है। मई-जून की कड़ी धूप और गरम हवाओं से जब हम झुलस जाते हैं तो अचानक ही वह बादलों का आंचल हमें उढ़ा देती है और बारिश की पहली फुहार से सारी उष्णता हर लेती है।
बहुत भाग्यशाली हैं हम जो मनुष्य रूप में इस इतनी अद्भुत, इतनी सुंदर प्रकृति के दर्शन कर पाते हैं, उसे अनुभव कर पाते हैं, उसका आनंद ले पाते हैं। दूसरी तरफ़ उन लोगों के प्रारब्ध पर पछतावा भी होता है जो इसे देख नहीं सकते, सिर्फ महसूस कर सकते हैं।
प्रकृति और साहित्य का संबंध तो अटूट और प्रमाणिक माना जाता है। बहुत से कवियों, लेखकों और साहित्यकारों ने अपनी कालजयी रचनाएँ प्रकृति के सान्निध्य में लिखीं। जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों को तो प्रकृति उपासक कवि कहा जाता है। प्रकृति ने ही लोगों कवि, शायर और चित्रकार बनाया है।
आमतौर पर हम झरनों की कल, पक्षियों का कलरव, अनेक प्रकार के अन्न, फूलों की महक, बारिश की बूंदों, ठंडी हवाओं और पेड़ों के झूमने को ही प्रकृति कहते हैं। लेकिन वास्तव में प्रकृति अपने अनगिनत रूपों के साथ हमारे बीच विद्यमान है। जहाँ वह एक ओर अपने मातृ सुलभ प्रेम को उपर्युक्त सभी रूपों में प्रदर्शित करती है तो दूसरी तरफ बिजली, तूफान, आँधी, बवंडर, भूकंप, चक्रवात, ज्वालामुखी जैसे रौद्र रूपों में भी हमारे सामने आती है। ठीक वैसे ही जैसे माँ अपने बच्चे की शैतानियों से तंग आकर व अपने धैर्य की पराकाष्ठा हो जाने पर उस पर बरस पड़ती है।
कवियों की बात ओर है वह तो शीतल बयार को भी अपनी कविता का विषय बना सकते हैं और आक्रांत ज्वालामुखी को भी। लेकिन, साधारण मनुष्य को अपने जीवन में सबकुछ साधारण, सरल और शांत हो ऐसी अपेक्षा होती है। सागर में आवाजाही करती लहरों को वो दूर से देखना पसंद करता है। क्योंकि डूबते हुए को बचाना तो मुमकिन हो जाता है लेकिन जिसे बहाव अपने साथ खींच ले उसका क्या कहा जा सकता है।
प्रकृति मानवीय संवेदनाओं में रची बसी है। जब भी हम दुखी होते हैं तब भी प्रकृति की शरण लेते हैं और जब खुश होते हैं तब भी प्रकृति का ही साथ चाहते हैं। कभी महसूस करके देखिए ये आपके साथ रोती है और आपके साथ हँसती भी है
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बुधवार, 20 मार्च 2013
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है
| जीवन |
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है
भविष्य सुधारने के लिए आप क्या करते हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की
कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गए तो …..? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। भविष्य
संवारने के सिलसिले में मैं अपने ब्लाग पर गोपाल दास नीरज की उस कविता को रख रही हूँ,
जिसमें उन्होंने फरमाया है कि कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं
मरा करता है, चंद खिलौने के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
सो, मित्रों परम आदरणीय, सुप्रसिद्ध
कवि व गीतकार नीरज जी के प्रति पूर्ण सम्मान भाव के साथ उनकी रचना मैं यहां अपनी
श्रृंखला में ऱख रही हूँ । इस आशा के साथ कि भविष्य संवारने की दिशा में जुटे
लोगों में इससे कुछ आशाओं का संचार हो पाए। सो पेश है गोपाल दास नीरज की यह अमर
रचना -
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों
मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।
मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आंख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
सोया हुआ आंख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गई तो क्या है
खुद ही हल हो गई समस्या
आंसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
खुद ही हल हो गई समस्या
आंसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रुठे दिवस मनाने वालों
फटी कमीज सिलाने वालों
कुछ दीयों के बुझ जाने से
आंगन नहीं मरा करता है।
फटी कमीज सिलाने वालों
कुछ दीयों के बुझ जाने से
आंगन नहीं मरा करता है।
खोता कुछ भी नहीं यहां पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों
चाल बदलकर जाने वालों
चंद खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है
चाल बदलकर जाने वालों
चंद खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है
मंगलवार, 19 मार्च 2013
जीवन संघर्षो से न घबराना मनुष्यता है
जीवन संघर्षो से
न घबराना मनुष्यता है
कई विचारकों का मत है कि अगर हम कोई
जोखिम नहीं लेते हैं, तो वह
अपने-आप में सबसे बड़ा जोखिम है। यह सही भी है कि ज़्यादातर लोग जोखिम लेने से डरते
हैं। इसकी कई वजहें होती हैं, लेकिन जो
सबसे बड़ी वजह है, वह है संकल्प
और विचार शक्ति की कमी ।
कहने को तो विचार शक्ति और संकल्प का
अभाव जानवरों में होता है, पर जब कोई
इंसान बिना विचारे कोई ऐसा काम कर बैठता है, तो कहा जाता है कि वह तो निरा पशु हो गया
है। यानी इंसान होकर भी अगर पशुओं जैसी जिंदगी जीएं, तो जीना क्या और मरना क्या ? इसीलिए वेद में कहा गया है- " मनुर्भव, यानी मनुष्य बनो। " इसका मतलब हे कि महज इंसान के वेश में हम
इंसान सही मायने में तब तक नहीं होते, जब तक हमारे अंदर इंसानियत के सद् गुण
पैदा नहीं होते और जब तक हम अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करते।
विज्ञान के मत में इंसान जब से धरती पर
पैदा हुआ है, लगातार
प्रगति कर रहा है। यह प्रगति इंसान को जानवरों से अलग करती है। धर्म भी कहता है कि
इंसान का जन्म लेना, तभी सार्थक
है, जब उसमें
मनुष्यत्व और देवत्व के रास्ते पर बढ़ने की इच्छाशक्ति और साधना हो। बहरहाल, जोखिम उठाना और जोखिम लेने से घबराना, दोनों ही प्रवृत्तियां इस बात को तय करती
हैं कि हम में कितनी इंसानियत बाकी है । हर इंसान में पशुता, मनुष्यता और देवत्व के गुण होते हैं।
शिक्षा, संस्कार, विचार ओर संकल्प-शक्ति जिस व्यक्ति में
जिस रूप में होती है, वह उसी तरह
बन जाता है । दरअसल, हमारे
मस्तिष्क की बनावट ऐसी है, जिसमें
विचारों की अनंत संभावनाएँ होती है। लेकिन एक आम इंसान अपनी शक्तियों का एक या दो
प्रतिशत ही इस्तेमाल करता है। शक्तियों के समुचित इस्तेमाल नहीं होने के कारण ही
किसी व्यक्ति के बेहतर इंसान बनने की संभावना कम होती है। यही वजह है कि ज़्यादातर
लोग पूरी ज़िंदगी पशुओं की तरह ही सिर्फ़ सोने-खाने में बिता देते है।
पर यहां सवाल यह है कि क्या जोखिम उठाना
हमेशा लाभदायक होता है? कभी-कभी तो
तमाम जोखिम उठाकर भी लोग ऐसा कार्य कर डालते है, जो न उनके लिए लाभदायी होते है, न परिवार और समाज के लिए, इस बारे में यह कहना उचित होगा कि ऐसा
जोखिम उठाना इंसानी संघर्ष का नमूना नहीं, बल्कि शैतान प्रवृत्ति का प्रतीक है।
इसलिए जोखिम उठाने से पहले यह विचार ज़रूर कर लेना चाहिए कि वह हितकरी हो सकता है
या अहितकारी। मौजूदा वक्त में आतंकवादियों, नक्सलवादियों या इसी तरह की प्रवृत्ति
वाले अपराधियों द्वारा हिंसा के सहारे कोई मकसद हासिल करने का काम शैतानी जोखिम के
दायरे में आता है। ऐसे जोखिम भरे कार्यों से सभी को नुकसान ही होता है।
गांधी जी ने कहा था कि " साध्य और साधक " की पवित्रता से ही व्यक्ति की सफलता का
ठीक-ठीक मूल्यांकन हो सकता है। मौजूदा दौर में ज़्यादातर लोगों के " साध्य " और "साधन" दोनों ही अपवित्र
हो गए हैं। इसलिए जो कुछ हासिल हो रहा है, उसे मानवीय संघर्ष का परिणाम नहीं कह
सकते हैं। यानी जोखिम ज़रूर उठाएँ, लेकिन साथ
ही, यह भी देखा
जाए कि यह जोखिम भरा काम खुद के लिए, समाज के लिए राष्ट्र और समूचे संसार के
लिए सकारात्मक है या नकारात्मक।
यह कैसे तय हो कि कौन सा काम सकारात्मक
नतीजे वाला हो सकता है और कौन सा नकारत्मक नतीजे वाला ? यानी किस काम को किया जाए और किसे छोड़ा
जाए ? इसका जवाब
यह है कि महापुरूषों के आचरण और वेद-पुराणों में दिए गए दृष्टांत इस काम में हमारी
मदद करते हैं। उनके मार्गदर्शन से हम सही या गलत का फैसला कर सकते हैं।
अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए जीवन
संघर्ष से घबराए बिना जब हम एक सकारात्मक नतीजे दे सकने वाले जोखिम का चुनाव करते
हैं, तो वास्तविक
अर्थों में हम हर प्रकार से दैहिक, भौतिक संकट को दूर कर सकते है। यही सच्ची
मनुष्यता है और मनुष्य होने के नाते हमें इसी नीति का पालन करना चाहिए ।
सोमवार, 11 मार्च 2013
मैं खुश होती हूँ
मैं खुश होती हूँ , जब कोई
सपना देखती हूँ
मैं खुश होती हूँ जब उसे साकार होते हुए देखती हूँ ..
मैं खुश होती हूँ जब उसे साकार होते हुए देखती हूँ ..
अगर विफल हो जाती हूँ तो कारण सोचती हूँ
फिर, सोचते-सोचते एक नयी दुनिया में भी पहुँच जाती हूँ..
फिर, सोचते-सोचते एक नयी दुनिया में भी पहुँच जाती हूँ..
बहुत समय तक इस दुनिया से कट जाने के बाद
मैं खुद को झकझोर के उठाती हूँ
पूछती हूँ खुद से, के …
“क्यों नही मैं वो पा पाती हूँ
जिसे सबसे ज्यादा पाने को अकुलाती हूँ”,
मैं खुद को झकझोर के उठाती हूँ
पूछती हूँ खुद से, के …
“क्यों नही मैं वो पा पाती हूँ
जिसे सबसे ज्यादा पाने को अकुलाती हूँ”,
व्याकुल नैना रहते है हर पल निराश
फिर करते है वो अपने इष्ट देव को याद
फिर करते है वो अपने इष्ट देव को याद
प्रभु के सुमरन से ही कर पाती हूँ , मैं खुद को तैयार
फिर लग जाती हूँ देखने उस सपने को हज़ार बार
फिर लग जाती हूँ देखने उस सपने को हज़ार बार
और फिर से खुश होकर तैयार हो जाती हूँ
भरने को एक नई और ऊँची उड़ान…..
भरने को एक नई और ऊँची उड़ान…..
और ऊँची....
और ऊँची उड़ान.......
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
basant panchami
वसंत पंचमी एक हिन्दू त्योहार है, इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।
यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कइ राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन
स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं।
प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे
साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था।जब फूलों
पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों
पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत
करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि
पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा
अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।
बसन्त पंचमी कथा
सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान
विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य
योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी
रह गई है जिसके कारण चारों आ॓र मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा
ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही
उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य
हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा
दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने
देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया,
संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में
कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को
वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती,
शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों
से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के
कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में
भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी
सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के
रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की
संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी
समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश
होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और
यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा
होने लगी जो कि आज तक जारी है।[1] पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन
में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।[2]
पर्व का महत्व
वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण
खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग
से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला
जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर
वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह
से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का
जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना
करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के
लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए
अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के
लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और
दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है।
चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने
उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।
पौराणिक
महत्व
इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की
अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से
जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर
बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य
भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम
में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से
प्रस्तुत किया। दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला
है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी
के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते
हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं
बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।
ऐतिहासिक
महत्व
वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद
दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार
पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर
जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें
नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी
आंखें फोड़ दीं।
इसके बाद की घटना तो जगप्रसिध्द ही
है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा।
पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर
चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।
चार बांस चौबीस गज, अंगुल
अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥
पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल
नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंद्रबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण
मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक
दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई)
यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।
वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध
है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य
बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम
बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा
के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती
छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए
काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी
अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा
उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के
घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।
कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर
जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं
बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर
अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल
मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा।
वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर
हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत
लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।
वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद
दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के
भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक
प्रवष्त्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिश्यों
का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।
गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी,
नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी
शासन का बहिश्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष
मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले
में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध
कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये।
उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज
सेना आ गयी। अत: युध्द का पासा पलट गया।
इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद
हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872
को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को
अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़करबर्मा की मांडले जेल में भेज
दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया ।
जन्म दिवस
वसंत पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर
विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस (28.02.1899) भी है। निराला जी के मन
में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से
निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हें 'महाप्राण'
कहते थे। एक बार नेहरूजी ने शासन की ओर से कुछ सहयोग का प्रबंध किया,
पर वह राशि उन्होंने महादेवी वर्मा को भिजवाई। उन्हें भय था कि यदि
वह राशि निराला जी को मिली, तो वे उसे भी निर्धनों में बांट
देंगे। जहां एक ओर वसंत ऋतु हमारे मन में उल्लास का संचार करती है, वहीं दूसरी ओर यह हमें उन वीरों का भी स्मरण कराती है, जिन्होंने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी।
मंगलवार, 29 जनवरी 2013
छत की मुंडेर पर,
बैठे थे तीन बंदर,
उनको देख हूक-सी उठी,
बैठे थे तीन बंदर,
उनको देख हूक-सी उठी,
दिल के अंदर,
आंखों में गांधी की तस्वीर झूल गई,
कुछ पल के लिए मेरी आत्मा,
खुद मेरे शरीर को भूल गई,
वे मेरी थाली में पड़ी रोटी को,
बड़े गौर से देख रहे थे,
बार-बार अपना मत्था,
मुंडेर पर टेक रहे थे,
मैंने अपनी रोटी,
उनके हवाले कर दी,
उनकी उम्मीदों की झोली भर दी,
वे मेरी दी रोटी नहीं खा रहे थे,
बार-बार उनके हाथ,
आसमान की ओर जा रहे थे,
खुले आसमान में,
गिद्धों का एक झुंड,
चक्कर काट रहा था,
बंदरों का भावुक दिल,
उनकी मंशा को भांप रहा था,
बंदरों ने एकाएक रोटियों को,
आसमान की ओर उछाला,
गिद्धों ने फुर्ती से उन्हें संभाला,
रोटियां पाकर,
नजरों से ओझल हो गए,
नजर घुमाई तो,
बंदर भी न जाने कहां खो गए,
पेट की भूख,
इंसान, जानवर, हैवान को,
एक माला में पिरो गई,
बंदरों की हरकत,
स्वर्ग में बैठे,
गांधी के नैनों को भिगो गई,
नजरों से मिली नजर,
दिल से दिल की बात हो गई,
गांधी के बंदरों से,
आज मुलाकात हो गई
आंखों में गांधी की तस्वीर झूल गई,
कुछ पल के लिए मेरी आत्मा,
खुद मेरे शरीर को भूल गई,
वे मेरी थाली में पड़ी रोटी को,
बड़े गौर से देख रहे थे,
बार-बार अपना मत्था,
मुंडेर पर टेक रहे थे,
मैंने अपनी रोटी,
उनके हवाले कर दी,
उनकी उम्मीदों की झोली भर दी,
वे मेरी दी रोटी नहीं खा रहे थे,
बार-बार उनके हाथ,
आसमान की ओर जा रहे थे,
खुले आसमान में,
गिद्धों का एक झुंड,
चक्कर काट रहा था,
बंदरों का भावुक दिल,
उनकी मंशा को भांप रहा था,
बंदरों ने एकाएक रोटियों को,
आसमान की ओर उछाला,
गिद्धों ने फुर्ती से उन्हें संभाला,
रोटियां पाकर,
नजरों से ओझल हो गए,
नजर घुमाई तो,
बंदर भी न जाने कहां खो गए,
पेट की भूख,
इंसान, जानवर, हैवान को,
एक माला में पिरो गई,
बंदरों की हरकत,
स्वर्ग में बैठे,
गांधी के नैनों को भिगो गई,
नजरों से मिली नजर,
दिल से दिल की बात हो गई,
गांधी के बंदरों से,
आज मुलाकात हो गई
शनिवार, 26 जनवरी 2013
गणतंत्र दिवस के
अवसर पर एक विचारणीय प्रश्न
पिछले कुछ वर्षों में इस विभाजन को स्पष्ट देखा जा सकता है!हमारा देश बहुत तेज़ी से बदल रहा है...लेकिन इसके दोनों चेहरे बहुत साफ़ साफ़ देखे जा सकते है!.पहला तो वह आधुनिक इंडिया है..जिसमे आसमान छूती इमारतें है,साफ़ सड़कें और बिजली से जगमगाते शहर हैं..! सड़क पर दौड़ती महँगी गाडियाँ विदेश का सा भ्रम पैदा करती है ! यहाँ लोग सूट बूट पहने शिक्षित हैं जो आम बोलचाल में भी अंग्रेज़ी बोलते हैं...! बड़े बड़े होटल ,मॉल और मल्टी प्लेक्स किसी सपने जैसे लगते हैं..! यहाँ के लोग इंडियन कहलवाना पसंद करते हैं...! यह हमारे देश का आधुनिक रूप है जो एक सीमित क्षेत्र में दिखाई देता है...! और इस चकाचौंध से दूर कहीं एक भारत बसा है जो अभी भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है..! यहाँ अभी सड़कें, होटल मॉल नहीं हैं..बिजली भी कभी कभार आती है...! यहाँ के लोग सीधे सादे है जो बहुत ज्यादा शिक्षित नहीं हैं, इसलिए इन्हें अपने अधिकारों के लिए अक्सर लड़ना पड़ता है..! इस भारत और इंडिया को देख कर भी अनदेखा करने वाले नेता हैं जो हमेशा अपना हित साधते रहते हैं ! लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि हमारी 70 % आबादी अभी भी गाँवों में रहती है । इन भारत वासियों के लिए न फिल्में बनती हैं ना कार्यक्रम ...! सभी लोग बाकी 30 % आबादी को खुश करने में लगे हैं....! तभी तो देखिये वर्षा न होने पर जहाँ लोग रो रहे होते हैं ,सूखे खेतों को देख कर किसान तड़पते होते हैं...दाने दाने को मोहताज़ हो जाते हैं ..! वहीं ये इंडियन रेन डांस करने जाते हैं ..इनके लिए कृत्रिम बरसात भी हो जाती है...! क्या कभी पिज़्ज़ा खाने वाले लोग उन भारतवासियों के बारे में सोचेंगे जो एक समय आज भी भूखे सोते हैं ???? क्या कभी हमारे नेता इन ऊंची इमारतों के पीछे अंधेरे में सिसकती उन झोंपड़ पट्टियों को देख पाएंगे जो इंडिया पर एक पैबन्द की भांति है....! इन में रहने वालों और गाँवों में रहने वालों में कोई अन्तर नहीं है.....! यहाँ बसने वाला ही सही भारत है जिसे कोई इंडियन देखना पसंद नहीं करता,लेकिन जब ये सुखी होंगे तभी इंडियन सुखी रह पाएंगे...इस इंडिया और भारत की दूरी को पाटना बहुत ज़ारूरी है....! ये दोनों मिल कर ही देश को विकसित बना सकते है....
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